मतदाता सूची से अपात्र नाम हटाने की प्रक्रिया जरूरी – विज
मतदाता सूची से अपात्र नाम हटाने की प्रक्रिया जरूरी - विज
चंडीगढ़, 2 अक्टूबर। हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार वही काम कर रहे हैं जो एक मुख्य चुनाव आयुक्त को करना चाहिए और वो काम है मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण करना ताकि कोई भी नाजायज आदमी जो वोट का हकदार नहीं है और उसने किसी तिकड़मबाजी से मतदाता सूची में अपने नाम डलवा दिए हैं तो उन नामों को डिलीट किया जा सके।
पत्रकारों से बातचीत के दौरान ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने कहा कि जो मतदाता यहां से कहीं दूसरी जगह ट्रांसफर होकर चले गए हैं या फिर कोई महिला यहां से कहीं और शादी कराकर चली गई या फिर जिन लोगों का देहांत हो गया हैं उन लोगों के नाम डालना और निकालना, यही चुनाव आयोग का काम है। इसको लेकर उन्होंने विपक्षी पार्टियों खासकर कांग्रेस पार्टी पर तीखा प्रहार किया।
ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने कहा कि कांग्रेस पार्टी को लगातार जनता नकार चुकी है और लगातार यह कई चुनाव हार चुके हैं इसलिए ये बौखला गए हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जैसे कोई बच्चा स्कूल में फेल होकर रोता है और कभी मास्टर को, कभी कमरे को तो कभी किसी पर दोष लगाता है उसी प्रकार ये हारे हुए है और अपनी झेप मिटाने के लिए ये कभी ईवीएम पर कभी चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हैं और मुझे ये लगता है कि जितनी भी हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाए हैं यह उन पर बारी-बारी प्रहार लगा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस की रहनुमाई राहुल गांधी कर रहे हैं और उनकी नसों में उनकी दादी का तानाशाही वाला खून बह रहा है। जैसे उन्होंने 1975-76 में इमरजेंसी लगाकर सभी संस्थाओं को खत्म कर दिया था और सारे अधिकार खत्म कर दिए थे। ये उसी तरह का भारत चाहते हैं लेकिन भारत वैसा नहीं बनना चाहता क्योंकि भारत प्रजातांत्रिक की सबसे बड़ी शक्ति है, भारत का उसमें ही विश्वास है, भारत का तानाशाही में विश्वास नहीं है। कांग्रेस तानाशाही लाना चाहती है और प्रजातंत्र को खत्म करना चाहती है।
वहीं, कांग्रेस नेत्री कुमारी शैलजा के बयान पर ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने कहा कि ये बच्चों वाली बातें करते रहते है, हिंदुस्तान में 22 प्रदेशों में इन सभी पार्टियों को उखाड़कर भाजपा में विश्वास व्यक्त कर चुके हैं और प्रजातंत्र में लोगों का फैसला ही अंतिम फैसला होता है। वहां के नेताओं ने क्या बयान दिए क्या किया यह कोई मायने नहीं रखता है जनता के फैसले को इन्हें भी मानना चाहिए और अपने कर्तव्यों पर जो कि इनके शासनकाल के है उसके बारे व पार्टियों के बारे में पुर्नविचार करना चाहिए।
